खरपतवार :-
धनिये फसल फसल के साथ अनेक खरपतवार उग आते है जो भूमि से नमी, पोषक तत्वों, स्थान धुप, आदि के लिए प्रति स्पर्धा करते है जिसके कारण पौधे के विकास एवं बढ़वार पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है अंतत: उपज में भारी कमी आ जाती है ।
खरपतवारों के नियंत्रण के लिए दो बार निराई गुड़ाई करनी चाहिए पहली बुवाई से ३०-४५ दिन बाद और दूसरी निराई गुड़ाई के ६०-७० दिन बाद जहाँ पौधे अधिक उगे हों वहां पहली निराई गुड़ाई के समय अनावश्यक पौधों को हटाकर पौधों की आपसी दुरी १०-१२ से.मी.कर देनी चाहिए ।
कीट नियंत्रण :-
चैंपा :-
यह धनिये पर आक्रमण करने वाला- पहला कीट है सामान्यत: पुष्पण के आरंभ होते ही आक्रमण होता है यह पौधे के कोमल अंगों का रस चूसता है ।
नियंत्रण :-
इसके नियंत्रण के लिए नीम का तेल या नीम का काढ़ा या गौमूत्र को माइक्रो झाइम के साथ मिलकर पम्प द्वारा तर-वतर कर छिडकाव करे ।
रोग :-
धनिये के फसल में बिभिन्न प्रकार के रोग लगते है जिनके कारण उपज तो कम होती है साथ उपज की गुणवत्ता भी निम्न कोटि की हो जाती है धनिये की प्रमुख रोगों की नियंत्रम विधियों का उल्लेख निचे किया गया है ।
उकठा :-
यह धनिये का सबसे भयंकर रोग है इस रोग के कारण पौधे मुरझा जाते है जिससे पौधों के विकास व बढ़वार पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है ।
रोकथाम :-
गर्मियों में गहरी जुताई ।
उचित फसल चक्र अपनाएं ।
बीजोपचार करके ही बिज बोएं ।
तना व्रण (स्टेम गांल) :-
यह धनिया का भयंकर रोग है इसमें पौधे का उपरी भाग सुखकर संक्रमित हो जाता है ।
नियंत्रण :-
इसको नियंत्रल के लिए नीम के तेल या गौ मूत्र से उपचारित कर बिज कि बुवाई करे ।
चूर्णी फफूंदी :-
यह एक फफूंदी जनित रोग है इस रोग की शुरुआत में पत्तियों एवं शाखाओं पर आटे जैसे सफ़ेद चूर्ण की परत जम जाती है अधिक प्रभावित होकर पत्तियां पिली पड़कर मुड़ जाती है ।
नियंत्रण :-
नीम का काढ़ा या गौ मूत्र या नीम का तेल मैक्रो झाइम के साथ मिलकर छिड़काव करे ।
म्लानि:-
इस रोग के कारण धनिये के पौध मुरझाकर गिरने लगते है ।
नियंत्रण :-
इस रोग कि रोकथाम के लिए सहिष्णु किस्मे जैसे एन - १३ और पि - १३० कि बुवाई करनी चाहिए ।
कटाई :-
यह फसल ९०-१०० दिन में पककर तैयार हो जाती है जब फुल आना बंद हो जाए और बिजोंके गुच्छों का रंग भूरा हो जाए तब फसल कटाई के लिए तैयार मानी जाती है कटाई के बाद फसल को खलिहान में छाया में सुखाना चाहिए पूरी तरह से सुख जाने पर दानों को अलग -अलग करके साफ कर लेते है इसके बाद में दानों को सुखाकर बोरियों में भर लेते है ।
उपज :-
धनिये की उपज भूमि की उर्वरा शक्ति उनकी किस्म व फसल की देखभाल पर निर्भर करती है प्रति हे.१२-१८ क्विंटल तक उपज मिल जाती है ।
पाले से बचाव :-
धनिये की फसल पर पाले से भी भारी हानि हो सकती है पाला पड़ने की संभावना नजर आते है एक हलकी सिचाई कर दे रात्रि के समय खेतमे चारों और धुआं करके भी फसल को पाले से बचाया जा सकता है ।
नीम का काढ़ा :---
२५ किलो नीम कि पत्ती हरा ताजा तोड़कर कुचल कर पीसकर ५० लीटर पानी में पकाए जब पानी २० - २५ लीटर रह जाये तब उतार कर ठंडा कर आधा लीटर प्रति पम्प पानी मिलकर प्रयोग करे ।
गौ मूत्र :--
१० लीटर देसी गाय का गौ मूत्र लेकर किसी पारदर्शी बर्तन प्लास्टिक या कांच का उसमे रखकर १० - १५ दिन तक धुप में रखकर आधा लीटर पानी में मिलाकर प्रयोग करे ।
धनिये फसल फसल के साथ अनेक खरपतवार उग आते है जो भूमि से नमी, पोषक तत्वों, स्थान धुप, आदि के लिए प्रति स्पर्धा करते है जिसके कारण पौधे के विकास एवं बढ़वार पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है अंतत: उपज में भारी कमी आ जाती है ।
खरपतवारों के नियंत्रण के लिए दो बार निराई गुड़ाई करनी चाहिए पहली बुवाई से ३०-४५ दिन बाद और दूसरी निराई गुड़ाई के ६०-७० दिन बाद जहाँ पौधे अधिक उगे हों वहां पहली निराई गुड़ाई के समय अनावश्यक पौधों को हटाकर पौधों की आपसी दुरी १०-१२ से.मी.कर देनी चाहिए ।
कीट नियंत्रण :-
चैंपा :-
यह धनिये पर आक्रमण करने वाला- पहला कीट है सामान्यत: पुष्पण के आरंभ होते ही आक्रमण होता है यह पौधे के कोमल अंगों का रस चूसता है ।
नियंत्रण :-
इसके नियंत्रण के लिए नीम का तेल या नीम का काढ़ा या गौमूत्र को माइक्रो झाइम के साथ मिलकर पम्प द्वारा तर-वतर कर छिडकाव करे ।
रोग :-
धनिये के फसल में बिभिन्न प्रकार के रोग लगते है जिनके कारण उपज तो कम होती है साथ उपज की गुणवत्ता भी निम्न कोटि की हो जाती है धनिये की प्रमुख रोगों की नियंत्रम विधियों का उल्लेख निचे किया गया है ।
उकठा :-
यह धनिये का सबसे भयंकर रोग है इस रोग के कारण पौधे मुरझा जाते है जिससे पौधों के विकास व बढ़वार पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है ।
रोकथाम :-
गर्मियों में गहरी जुताई ।
उचित फसल चक्र अपनाएं ।
बीजोपचार करके ही बिज बोएं ।
तना व्रण (स्टेम गांल) :-
यह धनिया का भयंकर रोग है इसमें पौधे का उपरी भाग सुखकर संक्रमित हो जाता है ।
नियंत्रण :-
इसको नियंत्रल के लिए नीम के तेल या गौ मूत्र से उपचारित कर बिज कि बुवाई करे ।
चूर्णी फफूंदी :-
यह एक फफूंदी जनित रोग है इस रोग की शुरुआत में पत्तियों एवं शाखाओं पर आटे जैसे सफ़ेद चूर्ण की परत जम जाती है अधिक प्रभावित होकर पत्तियां पिली पड़कर मुड़ जाती है ।
नियंत्रण :-
नीम का काढ़ा या गौ मूत्र या नीम का तेल मैक्रो झाइम के साथ मिलकर छिड़काव करे ।
म्लानि:-
इस रोग के कारण धनिये के पौध मुरझाकर गिरने लगते है ।
नियंत्रण :-
इस रोग कि रोकथाम के लिए सहिष्णु किस्मे जैसे एन - १३ और पि - १३० कि बुवाई करनी चाहिए ।
कटाई :-
यह फसल ९०-१०० दिन में पककर तैयार हो जाती है जब फुल आना बंद हो जाए और बिजोंके गुच्छों का रंग भूरा हो जाए तब फसल कटाई के लिए तैयार मानी जाती है कटाई के बाद फसल को खलिहान में छाया में सुखाना चाहिए पूरी तरह से सुख जाने पर दानों को अलग -अलग करके साफ कर लेते है इसके बाद में दानों को सुखाकर बोरियों में भर लेते है ।
उपज :-
धनिये की उपज भूमि की उर्वरा शक्ति उनकी किस्म व फसल की देखभाल पर निर्भर करती है प्रति हे.१२-१८ क्विंटल तक उपज मिल जाती है ।
पाले से बचाव :-
धनिये की फसल पर पाले से भी भारी हानि हो सकती है पाला पड़ने की संभावना नजर आते है एक हलकी सिचाई कर दे रात्रि के समय खेतमे चारों और धुआं करके भी फसल को पाले से बचाया जा सकता है ।
नीम का काढ़ा :---
२५ किलो नीम कि पत्ती हरा ताजा तोड़कर कुचल कर पीसकर ५० लीटर पानी में पकाए जब पानी २० - २५ लीटर रह जाये तब उतार कर ठंडा कर आधा लीटर प्रति पम्प पानी मिलकर प्रयोग करे ।
गौ मूत्र :--
१० लीटर देसी गाय का गौ मूत्र लेकर किसी पारदर्शी बर्तन प्लास्टिक या कांच का उसमे रखकर १० - १५ दिन तक धुप में रखकर आधा लीटर पानी में मिलाकर प्रयोग करे ।
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